पर्यावरण बचाने के लिये 20 लाख पेडों नें लिया जन्म, बना विश्व रिकॉर्ड.
हमारी प्रकृति हमारी धरोहर के लिए हम सब एक हैं। झाबुआ की धरती से उठी यह पुकार अब दूर-दूर तक गूँज रही है। अपनी दिलकश ख़ूबसूरत लैंड स्केपिंग के लिए सबको लुभाने वाले आदिवासी बाहुल्य झाबुआ को हरा-भरा बनाने के लिए हजारों हाथ एक साथ उठ खड़े हुए हैं। जिला प्रशासन की एक पहल पर स्व-सहायता समूह की 18 सौ से ज्यादा महिलाओं ने 20 लाख सीड़ बॉल बना कर दुनिया के सामने न केवल नया किर्तीमान रच दिया बल्कि उन्होंने यह भी साबित कर दिया कि वे ही पर्यावरण की सच्ची पहरेदार भी हैं। यहाँ की कलेक्टर नेहा मीणा के इस नवाचार को इन महिलाओं ने रिकॉर्ड वक्त में साकार कर दिखाया। जन अभियान बन चुके पर्यावरण के इस महायज्ञ में इन महिलाओं के साथ-साथ कई अन्य लोगों ने भी हाथ बँटा कर अपनी आहुति दी। सीड बॉल है क्या, इसको समझना बेहद जरुरी है। मूलत: जापान की यह तकनीक जंगल खड़ा करने की नायाब तरक़ीब है। मिट्टी, खाद, पानी और बीज के ज़रिए ऐसी बॉल तैयार की जाती हैं, जिन्हें मानसून की दस्तक होते ही जंगलों में बिखेर दिया जाता है। बारिश के पानी से बॉल में दबा बीज अंकुरित होता है और फिर नन्हा पौधा अपनी जड़ें जमा कर पेड़ बन जाता है। झाबुआ में इसके लिए बकायदा एक एनजीओ से प्रोफेशनल ट्रेनिंग ली गई और उन्हीं के मार्गदर्शन में इन्हें तैयार किया गया। गौरतलब है कि सीड़ बॉल का सक्सेस रेशो लगभग 70 से 80 फीसदी तक है। ऐसे में पर्यावरण के नज़रिये से यह प्रयोग झाबुआ के लिए यक़ीनन मील का पत्थर साबित होगा। मध्यप्रदेश सरकार के नमामि गंगे जल गंगा संवर्धन अभियान के तहत 5 जून से 16 जून तक कई कामों की शुरुआत की गई जिसमें नदी, नाले, तालाब और बावडियों की साफ़-सफ़ाई और गहरीकरण का काम किया जा रहा है। इसी अभियान के तहत 16 जून को जिले के कई इलाकों में एक साथ 20 लाख सीड़ बॉल का छिड़काव कर वर्ल्ड रिकॉर्ड बना डाला। यह रिकॉर्ड ‘वर्ल्ड बुक ऑफ लंदन’ में दर्ज किया गया। प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने भी इस काम की सराहना की है। केबिननेट मंत्री श्रीमती निर्मला भूरिया ख़ुद इस अभियान का हिस्सा बनीं। पर्यावरणविद् भी इस प्रयोग से बेहद आशान्वित हैं।